मरीजों का डेरा
प्रातः मेरे मन में ख़्याल आता हैं
जो मेरे तन को रौंद के चले जाता हैं।
प्रवेश लेती हु उस कक्ष पर
कुछ पुस्तकी ज्ञान की भूख पर
जिम्मेदारी की पोटली लिए चलती हु उस पक्ष पर
खूब तजुर्बे भेजती है साथ
कहती हैं कल आना खाली हाथ।
पल में सुख की भेंट को देखू
क्षण में दुख का हाल
रोने की किलकारी झेल न पाए आस।
हर रोज़ निहारती मरीजों का डेरा
सेवाभाव से आत्मनिर्भर का ये पथ मेरा।
~आंचल सैय्याम